गरीबी का नसीब ग्रहों से कोई संबंध नहीं है गरीबी सामाजिक दुर्व्यवस्था का कारण है

आज सदियों से चली आ रही परंपरा जिसमें पहले राजा और प्रजा होते थे। युग बदल गया नाम बदल गया। प्रजा से नागरिक हो गये। संविधान बनाया गया। सबको बराबरी का दर्जा दिया गया। परंतु प्रजा से बने नागरिक पहले भी गरीब थे आज भी गरीब हैं आगे भी गरीब ही रहेंगे। गरीबी को धर्म से जोड़ दिया गया है। धार्मिक और वर्ण व्यवस्था को सिर्फ जीवन को सुचारू रूप से चलाने के लिए और जिसे जो काम अच्छा लगे जिसमें सभी को उसकी इच्छा के अनुसार काम करने की आजादी थी। आज इस गरीबी को धर्म के साथ राजनीति में बदल दिया गया। गरीब और दरिद्र-नारायण जैसे शब्दों ने गरीबी को आधुनिकता में बदल दिया। भीख मांगने को सिर्फ हमारे देश में महान कार्य के रूप में मानने की प्रथा बनाई गई। भगवान महावीर और भगवान बुद्ध जैसे सर्वश्रेष्ठ सर्वोच्च संत महात्माओं ऋषि मुनियों को भीख मांगने का अर्थ अपने अहंकार का विसर्जन करना था। आज उसके असली अर्थ का मतलब ही बदल दिया गया है। आज हमारे राजनेताओं को देश विदेश भेजा जाता है। और जो सबसे अधिक धन मांगकर लाता है उसकी उतनी बड़ा स्वागत किया जाता है। भीख मांगने का एक नया शब्द कर्जा मांगने से भी जोड़ दिया गया है। जिस देश में विकास समृद्धि पारदर्शिता को कर्जदार की संज्ञा दी जा रही है उस देश से गरीबी को मिटाना मुश्किल ही नहीं असंभव है। आज देश की हालत बद से बद्तर होती जा रही है जो जितना बड़ा भ्रष्टाचार कर धन संपदा जुटा लेता है आज उसकी बेइज्जती बहिष्कार की जगह पूजा की जा रही है। भ्रष्टाचार को शिष्टाचार में बदल दिया गया है।
आज संपत्ति पद प्रतिष्ठा प्राप्त करने वाले किस ढंग से धन पद प्रतिष्ठा अर्जित कर रहे हैं उसकी आलोचना करने के बजाय पूज्यनीय जैसे अध्यात्मिक शब्दों से नवाजा जा रहा है।
गुजरात राज्य के दक्षिण गुजरात में लगभग सभी सरकारी कचेरियों में सूचना अधिकार अधिनियम के तहत मांगी गई श्रमयोगियो को लघुतम मासिक वेतन प्रोविडेंट फंड ईएसआईसी युनिफोर्म सुरक्षा स्वास्थ्य के साधनों में एक भी कार्यालय में कोई सबूत न मिलना अपने आप में हास्यास्पद के साथ दुर्भाग्यपूर्ण शरमजनक है।