विश्व के लगभग सभी स्थानों में राम नवमी हर्षोल्लास के साथ संपन्न

*रामनवमी की हार्दिक बधाई*
                         वेदिक ब्राह्मण परिवार भारत

*रामनवमी विषेश*

*प्रभु श्रीराम केवल हिंदुओं के मर्यादा पुरुषोत्तम नहीं सदियों पहले से श्री राम-कथा का प्रसार भारत से बाहर कई दूर देशों तक हो चुका है।*

*श्रीराम केवल एक कथा या काव्य नहीं, बल्कि युग-युगांतव्यापी मानवीय अनुभव और उन्मेष है, जिसे संस्कृति के रूप में पहचानना चाहिए।*

*रामायण से जो मानवीय मूल्य-दृष्टि सामने आयी, वह देश-काल की सीमाओं से ऊपर उठ गयी है। वह उन तत्वों को प्रतिष्ठित करती है, जिन्हें मानवता ने अपनी लंबी विकास-यात्रा के चरम मूल्य के रूप में पाया है।*

*इसीलिए रामायण केवल पढ़े-लिखे लोगों की चीज न रह कर लोक मानस का अंग बन सकी।*

*राम-चरित की जीवंतता के कई स्तर और पहलू हैं, जिन कारणों से ही वह भारतीय संस्कृति का एक आधार बन गयी।*

*उसी जीवंतता के कारण वह दूर देशों तक फैली और वहां के जन-जीवन में भी गहरे पैठ सकी।*

*इसीलिए राम केवल भारतवासियों या हिंदुओं के मर्यादा पुरुषोत्तम नहीं हैं, बल्कि बहुतेरे देशों, जातियों के भी मर्यादा-पुरुष हैं, जो भारतीय नहीं।*

*राम-कथा मूलत: और अंतत: सांस्कृतिक मूल्यों की शिक्षा है।*

*रामायण के प्रसंग आज भी प्रासंगिक सांस्कृतिक मूल्य आर्थिक, राजनीतिक परिवर्तनों की तुलना में दीर्घकालीन रूप से अपरिवर्तित रहते हैं।*

*आज भी राम-कथा हमें और दूर देशों के लोगों को भी छूती है, तो इसलिए क्योंकि उसमें सत्य और असत्य की, अच्छाई और बुराई, धर्म और अधर्म की चिरंतन टकराहट की कथा है।*

*वह टकराहट मनुष्य के समक्ष आज भी है, केवल उसका रूप बदला है।*

*इसीलिए रामायण के विभिन्न प्रसंग, पात्र हमारे लोक जीवन (जिस हद तक लोक जीवन बच रहा है) में आज भी प्रासंगिक होते रहते रहते हैं।*

*क्रोध, मोह, लोभ, क्षोभ, शोक, वचन-पालन आदि के प्रसंग तथा भरत जी, मंथरा, हनुमान जी, सुग्रीव जी, रावण, विभीषण जी आदि कुछ पात्र उदाहरण हैं।*

*आज भी लोग उस कथा-परिवेश और नाना प्रसंगों से अपने को जोड़ पाते हैं।*

*वाल्मीकि जी, तुलसीदास जी, कंबन जी आदि से अलग देश-विदेश में असंख्य कवियों ने श्री राम की महिमा अपने-अपने ढंग से गायी है।*

*पीढ़ी-दर-पीढ़ी विभिन्न देशों के लाखों लोगों ने लीला के रूप में रामायण को बार-बार जिया है और उससे मिलते मूल्य व संस्कार को नवीकृत करते हुए अपनाया है।*

*यह अकारण नहीं कि राम-कथा का प्रचार जब भारत की सामाओं से बाहर होने लगा, तब वहां पात्रों, प्रसंगों को अलग तरह से महत्व दिया गया।*

*उदाहरणार्थ, कंबोडिया और इंडोनेशिया के रामायण में और जन-मानस में हनुमान जी का चरित्र अधिक केंद्रीय है, संभवत: इसलिए रामायण के सबसे नि:स्वार्थ पात्र हनुमान जी हैं।*

*हनुमान जी में निष्काम-कर्मी व्यक्तित्व का रूप निखरा है, आखिर जो निष्काम है, वही सच्चे अर्थो में स्वतंत्र-कर्मी है।*

*राम-कथा में जीवन-दर्शन का संपूर्ण उत्तर हैं, अत: जो लोग सांस्कृतिक मूल्यों की तुलना में आर्थिक स्वार्थो, मूल्यों को अधिक महत्व देते हैं या सभी मूल्यों को आर्थिक या राजनीतिक संबंधों से निकलता मानते हैं, वे बुनियादी भूल करते हैं।*

**तुलसीदास जी ने लिखा:-*

*‘रामकथा सुंदर करतारी,* *संशय विहग उड़ावन हारी.’*

*वाल्मीकि जी या तुलसीदास जी लिखित पूरी कथा पढ़ लेने मात्र से जीवन-दर्शन का संपूर्ण उत्तर मिल सकता है।*

*श्रद्धावान के लिए वह धर्म-कथा है, साहित्य-कला प्रेमी के लिए वह क्लासिक साहित्य भी है, किंतु दर्शन, राजनीति, नैतिकता और सामंजस्यपूर्ण व्यवहार के सूत्र खोजनेवाले बुद्धिवादी के लिए भी रामायण में प्रचुर सामग्री है।*

*आज भी सभी के लिए सर्वोत्तम आदर्श हैं भगवान श्री राम।*

*गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं:-*

*‘पवन: पवतामस्मि राम: शस्त्रभृतामहम् झषाणां मकरश्चास्मि स्त्रोतसामस्मि जाह्न्वी.’ (10/ 31)*

*अर्थात् :-  मैं पवित्र करनेवालों में वायु और शस्त्रधारियों में राम हूं, मछलियों में मगरमच्छ और नदियों में श्रीभागीरथी गंगा हूं।*

*अत: जैसे वायु, मगरमच्छ और महान नदियों का महत्व मानवमात्र के जीवन के लिए यथावत है, उसी तरह आज भी शस्त्रधारियों, वीरों, राजपुरुषों के सर्वोत्तम आदर्श भगवान श्री राम ही हैं।*

*इसलिए शासन, अनुशासन और रक्षकों के लिए श्री राम का आदर्श आज भी प्रासंगिक है।*

*ज्ञात इतिहास में सदियों तक पीछे देख लीजिए किस शासक, महासचिव, प्रेसिडेंट, वायसराय, बादशाह, सुलतान या राजा को श्रीराम की तुलना में प्रस्तुत कर सकते हैं?*

*यदि रामायण को काल्पनिक कथा कहकर उड़ाना चाहें, जैसा मार्क्‍सवादी इतिहासकारों से लेकर अभी वेंडी डोनिगर जैसे ‘इंडोलॉजिस्टों’ की जिद है, तो उनमें भी अंतर्विरोध है।*

*पहले तो उसे काल्पनिक कहना ही बताता है कि राम-कथा को यथार्थ मानने पर उस से उभरते मूल्यों को आदर्श माना जायेगा।*

*दूसरी ओर, वही लोग हिंदू धर्म और समाज की निंदा करने में रामायण के ही उदाहरणों को सामने रखते हैं, जैसे, शंबूक-वध या सीता का परित्याग आदि।*

*चाहे शत्रुता-भाव से ही सही, यह परोक्ष रूप से रामायण की प्रासंगिकता की स्वीकृति है।*

*राम-कथा और कृष्ण-कथा, रामायण और महाभारत, संपूर्ण भारत को एक ऐसे सूत्र में जोड़ते हैं, जैसा कुछ और नहीं जोड़ता।*

*जैसा रवींद्रनाथ टैगोर ने कहा था:- शताब्दियों पर शताब्दियां बीतती गयीं, लेकिन भारत में रामायण-महाभारत का स्नेत तनिक भी नहीं सूखा।*

*प्रतिदिन गांव-गांव, घर-घर, पंसारी की दुकान से लेकर बड़े महलों तक राम-नाम पर एक सी श्रद्धा है।*

*आज राजनीतिक, मजहबी या विचारधारात्मक, जिस भी रूप से, जब भी, जिसने भी, भारत को तोड़ने, बाल्कनाइज करने या मतांतरित करने के लिए जब भी अभियान चलाया जाता हैं, उसके लिए उनको राम और कृष्ण के आदर्श पर, उनकी कथाओं पर, उनके प्रति श्रद्धा पर कुठाराघात करना जरूरी होता है।*

*वह जानते हैं की उनके पास इसके अलावा अन्य को रास्ता नहीं हैं जिससे हिन्दू भावनाओं को ठेस पहुंचाई जा सके।*

*क्योंकि श्रीनगर के राम-वन, तुलसी-वन से लेकर रामेश्वरम तक, तथा द्वारका के द्वारकाधीश से इंफाल के गोविंद-मंदिर तक, जो भारत को ह्दय से जोड़ता है, वही हमारी मूल एकता है, अतएव इसका राष्ट्रीय महत्व भी है।*

*आज हमारी शिक्षा दिनों-दिन पूर्णत: अंगरेजी, विदेशी रूप ले रही है, इसलिए अधिकतर बौद्धिक चर्चा पश्चिमी अवधारणाओं के चौखटे में होती है।*
*उसमें श्रद्धा और बुद्धि को अलग-अलग करके देखने का चलन है।*

*रामायण को ‘जीवित महाकाव्य’ कहा गया है, निस्संदेह, यह जीवंतता आज दुर्बल हुई है, बल्कि दिनों-दिन दुर्बल हो रही है, किंतु अब भी यह मरी नहीं है।*

*अंगरेजी शिक्षा के दौर में लोक-जीवन से दूर होती राम-कथा समझने की बात यह है कि इस ‘जीवित महाकाव्य’ की जीवंतता कम होना हमारा आत्मवान मनुष्य के रूप में कम होना है।*

*अब रामलीलाएं उस रूप में नहीं होतीं, जैसे पहले होती थी, पहले उसे ‘जिया’ जाता था, अब उसे केवल ‘देखा’ जाने लगा है, वह भी संक्षिप्त रूप, महज मनोरंजन के लिए।*

*पहले रामायण पढ़ना या मौखिक कंठस्थ करना हमारी शिक्षा का एक अनिवार्य, सहज अंग था,*

*लेकिन आज की हमारी आधुनिक शिक्षा निति के चलते मेधावी छात्र भी रामायण जैसे अनमोल साहित्य से अनजान हैं।*

*इसीलिए आज के संजीदा माता-पिता, बुद्धिजीवी भी सोच में पड़ जाते हैं कि रामायण को कैसे पढ़ें, इसके बारे में बच्चों को क्या बतायें?*

*अब आधी-अधूरी शिक्षा के कारण कोई रामायण को पुरावशेष मानता है, तो कोई रूपक, कोई निरी भक्ति, तो कोई एक गल्प मात्र।*

*इनमें से किसी का खंडन या विरोध करना जरूरी नहीं है, मगर जब बच्चे पूछते हैं, ‘क्या राम भगवान थे?’ तो माता-पिता क्या उत्तर दें।*

*बचपन से ही शिक्षा का माध्यम अंगरेजी होते जाने से किशोरों, युवाओं का स्वयं वाल्मीकि जी या तुलसीदास जी को पढ़ना असंभव होता जा रहा है।*

*कृषि-जीवन संकुचित होते जाने, गांव-परिवार के बिखरने से रामायण लोक-जीवन से छिनती जा रही है।*

*इसलिए प्रश्न और विकट रूप में उभरता है. अब रामायण को कैसे पढ़ें, पढायें, या पढ़ायें ही नहीं?*

*संभवत: इस का उत्तर नये युग में, नयी पीढ़ी स्वयं ढूंढ़ेगी लेकिन आज आवश्यकता यह है कि वह अपनी भाषा से न टूटे।*

*महज बोल-चाल की भाषा नहीं, बल्कि साहित्य की, सुसंस्कृत भाषा से भी वह जुड़े रहें।*

*जिस गंभीरता और सावधानी से हम अंगरेजी सीखते हैं, उसी सावधानी से हिंदी, संस्कृत एवं अपनी राजकिय भाषा भी बच्चों को अवश्य पढ़ायें।*

*जब अपनी भाषा जानना गौरवपूर्ण रहेगा, तो उपयरुक्त प्रश्न का उत्तर नये देश-काल में स्वयं उपलब्ध हो जायेगा, संस्कृति का मूल-निवास भाषा में होता है।*

*आज हमारे देश की अनेक समस्याओं, उलझनों के बढ़ने और मर्यादाओं के टूटने की कुंजी हमारी रामायण में है।*
वेदिक ब्राह्मण परिवार भारत द्वारा सभी देश वासियो को हार्दिक शुभकामनाएँ ।

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