जीवन में एकाग्रता की रहस्य- -ओशो

कुछ दिन ध्यान में जी लगता है, फिर कुछ दिन पूजा और भजन चलता है, लेकिन एकाग्रता कहीं भी नहीं होती। अपनी इस स्थिति से परेशान हूं। कृपा कर मुझे साधें।

मन का स्वभाव ऐसा। न यहां लगता, न वहां लगता। मन का स्वभाव है द्वंद्व। जो करोगे वहीं से उचटा हुआ लगेगा। जहां हो वहां से भागा हुआ रहेगा। जहां नहीं हो वहां का रस जन्मेगा। जो मिला, व्यर्थ हो जाता है। जो नहीं मिला, वे दूर के ढोल बड़े सुहावने लगते हैं।

मन के इस स्वभाव को समझो। न तो ध्यान काम आता, न भजन काम आता; मन के स्वभाव को समझना काम आता है।

मन की यह प्रक्रिया है। पद मिल जाए तो असंतुष्ट,पद न मिले तो असंतुष्ट। पद न मिले तो पीड़ा, पद मिल जाए तो व्यर्थता का बोध। गरीब रोता, अमीर नहीं है। अमीर रोता कि अमीर हो गया, अब क्या करूं?

जो भी तुम्हारे पास है, वह पास होने के कारण ही दोकौड़ी का हो जाता है। और जो तुमसे बहुत दूर है, दूर होने के कारण ही उसका बुलावा मालूम होता है।

मन के इस आधारभूत जाल को समझो। इसे पहचानो। यह ध्यान और भजन का ही सवाल नहीं है। भोजन करो तो मन में उपवास का रस उमगता है कि पता नहीं, उपवास करनेवाले न मालूम किस गहन शांति और आनंद को उपलब्ध हो रहे हों। उपवास करो तो भोजन की याद आती है।

जीवन के प्रत्येक पल तुम ऐसा ही पाओगे।

बाग में लगता नहीं, सहरा सेघबड़ाता है जी

अब कहां ले जाके बैठें ऐसे दीवाने को हम

बगीचे में बिठाओ तो लगता नहीं। मरुस्थल में ले जाओ तो घबड़ाता है।

बाग में लगता नहीं, सहरा सेघबड़ाता है जी

अब कहां ले जाके बैठें ऐसे दीवाने को हम

मन एक तरह का पागलपन है, एक तरह की विक्षिप्तता है। मन से मुक्त होना ही मुक्ति है। मन के पार होना ही स्वस्थ होना है। तो पहली तो बात, मन के इस स्वभाव को समझने की कोशिश करो। अक्सर लोग समझने की कम कोशिश करते हैं, छुटकारा पाने की ज्यादा कोशिश करते हैं। और छुटकारा बिना समझे कभी नहीं है। तो तुम्हारी आकांक्षा यह होती है, कैसे झंझट मिटे। लेकिन बिना समझे झंझट मिटी ही नहीं। नासमझी में झंझट है।

तो तुम चाहते हो, कैसे इस मन से छुटकारा हो?लेकिन पहले इस पहचानो तो। इससे दोस्ती तो साधो। इससे परिचय तो बनाओ। इसके कोने-कांतर तो खोजो। दीया तो जलाओ कि इसके सारे स्वभाव को तुम ठीक से देख लो। उस देखने में, उस दर्शन में, उस साक्षीभाव में ही तुम पाओगे विजय की यात्रा पूरी होने लगी।

जिस दिन कोई मन को पूरा समझ लेता है, उसी दिन मन विसर्जित हो जाता है। जैसे सूरज के ऊगने परओसकण तिरोहित हो जाते हैं, ऐसे ही बोध के जगने पर मन तिरोहित हो जाता है। जैसे दीये के जलने पर अंधेरा नहीं पाया जाता, ऐसे समझ के, प्रज्ञा के दीये के जलने पर मन नहीं पाया जाता।

तो मन से लड़ो मत–पहली बात। लड़ने का अर्थ ही नासमझी है। लड़कर कभी कोई जीता? तुमने यही सुना है कि जो लड़े वे जीते। मैं तुमसे कहता हूं, लड़कर कोई कभी जीता? समझकर जीत होती है। लड़नेवाले तो नासमझ हैं।लड़ोगे किससे! छायाओं से लड़ रहे हो।

जैसे कोई अपनी छाया से लड़ने लगे, खींच ले तलवार, करने लगे हमला। परिणाम क्या होगा? छायाकटेगी? परिणाम यही होगा, खुद ही थकेगा। और डर है कि छाया से लड़ने में कहीं अपने हाथ-पैर न काट ले। क्रोध में,उबाल में, पागल न हो उठे। कहीं ऐसी घड़ी न आ जाए कि विक्षिप्तता में अपने को ही काट ले।

अक्सर मन के साथ लड़नेवाले ऐसी ही स्थिति में पड़ जाते हैं। मन तुम्हारा है; तुम्हारी छाया। है नहीं, बस छाया जैसा है।

रोशनी बढ़ाओ।

थोड़े जागकर मन को समझो।

जब ध्यान करो और मन कहे, भजन में, तो जराजागकर देखो, एक तरफ खड़े होकर देखो कि मन क्या कह रहा है। जब भजन करो और मन कहे, ध्यान लगाओ, तबजागकर देखो कि मन क्या कह रहा है। इसकी चालबाजियांपहचानो। इसकी कूटनीति पहचानो। मन बड़ा राजनीतिज्ञ है। यह तुम्हें भटकाए रहता है। यह तुम्हें चलाए रहता है।

और तुमने ध्यान करके भी देख लिया, वहां भी नहीं लगा। और तुमने भजन करके भी देख लिया, वहां भी नहीं लगा। तो अब यह तो समझो कि मन कहीं लगेगा ही नहीं। मन का लगना धर्म नहीं। न लगना मन की आदत है। कहीं लगता नहीं। जो नहीं लगता वही मन है।

तो अब जब मन तुमसे कहे कि ध्यान करो, क्या भजन में पड़े हो? तो जागकर देखना कि यह फिर वही मन,जो कहीं नहीं लगता, भजन में भी नहीं लगा था; तब इसने कहा था, ध्यान करो। अब कहता है भजन करो। पहले कहा,संसार में उलझे रहो। फिर कहा, संन्यास ले लो। अब संन्यास में भी नहीं लगता; कहता है संसार में लौट चलो।

इस मन को जरा देखना। कुछ करने की बात नहीं है,सिर्फ शांत भाव से देखना। तुम्हारे देखने में ही तुम पाओगे मन गिरने लगा। तुम पर उसकी पकड़ जाने लगी। तुम पर पकड़ छूट जाए। तुम थोड़े शिथिल हो जाओ मन के पास से। तुम थोड़े बाहर सरकने लगो।

न तो ध्यान से घटती है बात, न भजन से; घटती है समझ से। इसलिए समस्त धर्मों का सार है जागरूकता।

प्रश्नकर्ता पूछता है, एकाग्रता नहीं बनती। एकाग्रता की खोज ही गलत है। जागरूकता खोजो। एकाग्रता की खोज तो फिर मन के ही सिक्कों में फंसे। यह मन ही है, जो कहता है एकाग्र बनो। यह तुम्हें असंभव चीजें करने को देता है। फिर वे नहीं होतीं तो तुम हारे-थके परेशान हो जाते हो।

एकाग्रता की कोई जरूरत ही नहीं है। थोड़ा जीवन की गणित की व्यवस्था के सूत्र समझने चाहिए।

पहला सूत्र: जब भी मन नहीं होता, तब तुम एकाग्र होते हो।

कभी अपने काम में पूरे संलग्न। चाहे बुहारी लगा रहे हो घर में, लेकिन पूरे संलग्न। अचानक तुम पाते हो, मन नहीं है। संगीत सुनते संलग्न, मन नहीं है। चित्र बनाते…किसी भी घड़ी जब तुम पाते हो कि मन नहीं है, तुम ही हो, तो एकाग्रता अपने आप घटती है।

एकाग्रता घटाई नहीं जा सकती। एकाग्रता मन की तन्मयता का परिणाम है। जब मन डूबा होता है तब तुम एकाग्र होते हो। जब मन उभर आता है तब तुम अनेकाग्र हो जाते हो। मन तुम्हें अनेक में बांट देता है; खंड-खंड कर देता है।

अब तुम चेष्टा कर रहे हो एकाग्र होने की। एकाग्र होने की चेष्टा और झंझट लाएगी क्योंकि करोगे किससे चेष्टा तुम एकाग्र होने की? मन से ही करोगे। सब चेष्टा मात्र मन से होती है।

अब तुम एक ऐसे काम में लगे हो, जैसे कोई आदमी अपने जूते के बंद खींच-खींचकर खुद को उठाने की कोशिश करे। खुद को कैसे उठाओगे जूते के बंद खींचकर? थोड़े-बहुत उछल-कूद लो, फिर बार-बार जमीन पर पड़ जाओगे। यह असंभव चेष्टा है।

मन कभी एकाग्र नहीं होता। जब एकाग्रता होती है तो मन नहीं होता। तो तुम मन के द्वारा एकाग्र होने की चेष्टा ही छोड़ो। तुम तो छोटे-छोटे कामों में रस लो। रस का परिणाम है एकाग्रता। बुहारी लगाओ तो ऐसे लगाओ, जैसे भगवान के मंदिर में लगा रहे हो। चाहे घर तुम्हारा ही हो; है तो भगवान का ही मंदिर।

भोजन करो तो ऐसे ही करो जैसे भगवान को ही भोग लगा रहे हो। भोजन तो तुम ही कर रहे हो लेकिन अंततः तो भगवान को ही लग रहा है भोग। वही तो तुम्हारे भीतर आकर भूख बना। उसी ने तो तुम्हारी भूख जगाई। वही तो तुम्हारे भीतर भूखा है। उसके लिए ही तो तुम भोजन दे रहे हो। रस जगाओ। एकाग्रता की बात मत उठाओ। रस का सहज परिणाम एकाग्रता है। जो करते हो उसे रसपूर्ण ढंग से करो। उसमें डुबकी लो। छोटे और बड़े काम नहीं हैं दुनिया में। जिस काम में तुम डुबकी ले लो, वही बड़ा हो जाता है। बुहारी लगाने में डूब जाओ, वही बड़ा हो जाता है।

कबीर कहते हैं: “खाऊं-पिऊं सो सेवा, उठूं-बैठूं सो परिक्रमा।’ मेरा उठना बैठना ही उस परमात्मा की परिक्रमा है। और जो मैं खाता-पीता हूं, यही उसकी सेवा है। रस!

मेरे देखे अधिक लोगों के जीवन का कष्ट यही है कि वे जीवन में कहीं भी रस नहीं ले रहे हैं। जो भी कर रहे हैं,बेमन से कर रहे हैं। कर रहे हैं क्योंकि करना है। खींच रहे हैं। जैसे बैलगाड़ी में जुते बैल; ऐसा जीवन को खींच रहे हैं। नाचते हुए, उमंग से भरे हुए नहीं।

अगर तुम कोई ऐसे काम में लगे हो, जिसमें तुम रस ले ही नहीं सकते तो बदलो वह काम। कोई काम जीवन से ज्यादा मूल्यवान नहीं है। अक्सर ऐसा हुआ है, हो रहा है कि लोग ऐसे काम में उलझे हैं जो उनमें रस नहीं जगाता। किसी को कवि होना था, वह जूते बेच रहा है, बाटा की दुकान पर बैठा है। और जिसको बाटा की दुकान पर बैठना था, वह कविता कर रहा है। तो उसकी कविता में जूते की पालिश की गंध आती। आएगी ही।

लोग वहां हैं, जहां उन्हें नहीं होना था। और यह विकृति के कारण है। क्योंकि तुमने कभी अपने सहज भाव को तो खोजा नहीं। किसी के पिता ने कहा कि दुकान करो। इसमें ज्यादा लाभ है। किसी के पिता ने कहा, डाक्टर बन जाओ। किसी की मां को खयाल था, बेटा इंजीनियर बने। परिवार को धुन थी कि बेटा नेता बने।

तो सब धक्का दे रहे हैं एक-दूसरे को कि यह बन जाओ, वह बन जाओ। कोई यह नहीं पूछता कि यह बेटा क्या बनने को पैदा हुआ है? इससे भी तो पूछो। थोड़े इसके हृदय को भी तो टटोलो। तो फिर लोग गलत जगहों पर पहुंच जाते हैं।

एक बहुत बड़ा सर्जन, जिसकी सारी जगत में ख्याति थी, जब साठ वर्ष का हुआ और उसकी साठवींवर्षगांठ मनाई गई तो सारी दुनिया से उसके मित्र इकट्ठे हुए,उसके मरीज इकट्ठे हुए और उन्होंने उसका बड़ा स्वागत किया। लेकिन वह बड़ा उदास था। उसके स्वागत में एक नृत्य का आयोजन किया गया था। तो जब लोग नृत्य करने लगे और वह सर्जन देखता रहा तो उसकी आंख से आंसू टपकने लगे।

उसके पास बैठे उसके मित्र ने पूछा, क्या मामला है?हम सब तुम्हारी वर्षगांठ पर इकट्ठे हुए प्रसन्नता से। यह नृत्य तुम्हारे स्वागत में होता है, तुम रोते क्यों हो? तुम्हारी आंख में आंसू क्यों हैं? तुम किस पीड़ा से भीग गए हो?

उसने आंसू पोंछ लिए। उसने कहा कि नहीं, वह कोई बात नहीं है। पर मित्र ने जिद्द की। कहा कि क्या तुम्हें कोई जीवन में विफलता मिली? तुम जैसा सफल आदमी नहीं है। तुमने जो आपरेशन किया, सफल हुआ। तुम्हारे जैसा कुशल सर्जन दुनिया में नहीं। फिर क्या?

लेकिन उसने कहा, मैं कभी सर्जन होना ही नहीं चाहता था। मेरा दिल तो एक नर्तक होने का था। आज नाच को देखकर मैं रो उठा। मैं छोटा-मोटा नर्तक होता, कोई मुझे न जानता तो भी मेरी तृप्ति होती। आज मैं दुनिया का सबसे बड़ा सर्जन हूं, लेकिन मेरी कोई तृप्ति नहीं है। मेरी नियति ही मुझे न मिली। तो आज भी जब मैं किसी को नाचते देखता हूं तो बस, मुझे याद हो आती है।

तुम अपनी जिंदगी को गौर से देखो। पहली तो बात–जो कर रहे हो उसमें रस लेने की कोशिश करो। हो सकता है तुमने रस का अभ्यास नहीं किया। तुम्हें किसी ने सिखाया ही नहीं कि रस का अभ्यास कैसे करना।

रस के अभ्यास का पहला सिद्धांत है कि जो भी कर रहे हो, इसका परिणाम मूल्यवान नहीं है। तुम्हें यही सिखाया गया है कि परिणाम मूल्यवान है। तुम करते हो, इससे दस रुपये मिलेंगे कि हजार रुपये मिलेंगे कि लाख रुपये मिलेंगे। लाख रुपये में मूल्य है, परिणाम में मूल्य है।

रस का सिद्धांत है, जो तुम कर रहे हो, वह अपने आप में मूल्य है। अंतर्निहित है मूल्य। हजार मिलेंगे, दस हजार मिलेंगे, वह बात गौण है। करने में जो डुबकी लगेगी वही बात महत्वपूर्ण है। अगर डूब गए तो मिल गए करोड़ों। अगर न डूबे और करोड़ों भी मिले तो कुछ भी न मिला। वह समय व्यर्थ गया, जो बिना डूबे गया। वे दिन व्यर्थ ही बीते,जो बिना डूबे बीते। जब रसधार न बही तो तुम जीए न जीए बराबर। रस-विमुग्धता में ही जीवन है। तो पहली तो बात जो कर रहे हो…।

तुमसे नहीं कहता कि जल्दी बदलने में लग जाना। क्योंकि हो सकता है, तुम अपना काम भी बदल लो और रस न आए। क्योंकि रस आने की तुम्हारी आदत ही न रही हो। तुमने रस बनाने की बात ही न बनाई हो।

तो पहले तो जो कर रहे हो उसमें रस लेने की कोशिश करना। सौ में पचास मौके तो ऐसे हैं कि तुम उसी में रस ले पाओगे। रस लेते ही एकाग्रता हो जाएगी।

देखा, स्कूल में छोटे बच्चे पढ़ते हैं; बाहर चिड़िया गुनगुनाने लगी गीत, बच्चा एकटक होकर सुनने लगता है। शिक्षक डंडा पीटता है टेबल पर, कि यहां ध्यान दो। एकाग्रता करो। एकाग्रता बच्चा कर ही रहा है। मगर शिक्षक पर नहीं कर रहा, यह बात सच है। यह ब्लैकबोर्ड पर नहीं कर रहा।ब्लैकबोर्ड पर लिखे अक्षरों पर नहीं कर रहा। लड़का तो एकाग्रता कर ही रहा है। एकाग्रता तो हो ही रही है। वह जो चिड़िया गीत गा रही है वह उसे सुन रहा है। शिक्षक कहता है, एकाग्रता करो। मन को ऐसा विचलित मत करो।

बात बिलकुल गलत कह रहा है शिक्षक। शिक्षक उसके मन को विचलित करने की कोशिश कर रहा है। वह एकाग्र है। अगर कोई बाधा न दे, तो यह सारा संसार थोड़ी देर के लिए मिट जाएगा। वह चिड़िया की गुनगुनाहट होगी,उसका गीत होगा, इस बच्चे की भावदशा होगी। और यह एक बात सीख लेगा–रस की।

रस चूंकि उसे चिड़िया के गीत में आ रहा है, इसलिए एकाग्र हो गया है। उसी कक्षा में ऐसे बच्चे भी होंगे, जिन्हें रस गणित के सवाल में आ रहा है। वे वहां एकाग्र हो गए होंगे।

हमें लोगों को एकाग्रता नहीं सिखानी चाहिए। उनका रस देखकर उन्हें दिशा देनी चाहिए। जो बच्चा गणित को सुनकर एकाग्र हो गया है, बाहर भौंकते कुत्ते, लड़तीबिल्लियां, गीत गाती चिड़ियां, रास्ते पर बैठे मदारी की बीन–कुछ नहीं सुनाई पड़ती। यह बच्चा आइंस्टीन होने को पैदा हुआ है। इसकी एकाग्रता ही खबर देती है।

अब इस बच्चे से तुम कहो, कि चिड़ियां गीत गा रही हैं, उन पर एकाग्रता करो, यह न कर पाएगा। यह संभव नहीं होगा।

हमें देखना चाहिए कि कहां हमारी एकाग्रता है। वहीं हमारा जीवन है। मगर आज अचानक जीवन बदलने का तुम्हारे हाथ में उपाय नहीं। आज तो पहचानने का भी उपाय नहीं कि कहां तुम्हारी एकाग्रता होती है। तुम तो भूल ही गए। तुम्हारे जीवन की सारी व्यवस्था उल्टी-सीधी हो गई है। दूसरों ने तुम्हें चला दिया। दूसरों ने तुम्हें मार्ग दे दिया। दूसरों ने तुम्हें दिशा और आदर्श दे दिए। तुम्हें पूरी तरह भरमा दिया है।

पहले तो जो काम कर रहे हो उसमें रस लेने की आकांक्षा जगाओ। जो काम कर रहे हो उसे इतने भाव से करो, इतनी मगनता से करो कि उससे अतिरिक्त ऊर्जा बचे ही नहीं विघ्न-बाधा डालने को।

एकाग्रता का और क्या अर्थ होता है? एकाग्रता कोई जबर्दस्ती थोड़े ही है। एकाग्रता बड़ी स्वाभाविक घटना है।

अब तुम यहां मुझे सुन रहे हो। जिनको मेरी बात में रस आ रहा है, वे एकाग्र हैं। एकाग्रता कर थोड़े ही रहे हो,एकाग्रता हो रही है। इसे समझने की कोशिश करो। तुम्हारे करने की थोड़े ही बात है। तुम थोड़े ही बैठे हो सब मांस-पेशियों को खींचकर, आंखें मुझ पर गड़ाकर और चेष्टा कर रहे हो कि एकाग्रता! ऐसे एकाग्रता करोगे तो तुम सुन ही न पाओगे, जो मैं कह रहा हूं। एकाग्रता सहज है। तुम्हें रस आ रहा है। उसी रस के कारण तुम चले आए हो। उसी रस के कारण तुम रोज चलते आए हो। वही रस तुम्हें लाता रहा है।

रस है तो एकाग्रता है।

तो तुम रस को जगाओ, एकाग्रता की बात ही छोड़ दो। अगर रस जगे ही न तो फिर समझो, फिर हिम्मत करो,साहस करो। बदलो उस व्यवस्था को, जिसमें रस नहीं जगता। हो सकता है वह व्यवस्था तुम्हारे लिए नहीं है।

तो दरिद्र हो जाना बेहतर है समृद्ध होने की बजाय। सड़क का भिखारी हो जाना बेहतर है सम्राट होने की बजाय–अगर रस आ जाए। क्योंकि रस ही सम्राट बनाता है।

तो कभी-कभी तुम किसी भिखारी के चेहरे पर ऐसी आभा देखोगे, जो सम्राटों के चेहरों पर नहीं दिखती।रसविमुग्ध है वह। अपने काम में लीन है।

रथचाइल्ड ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि एक भिखारी आया, पांच बजे सुबह उसका दरवाजा खटखटाने लगा। वह बड़ा नाखुश हुआ। पांच बजे सुबह नींद से भरे उसको उठाया। वह बड़ा झल्लाता हुआ बाहर आया। ऐसे वह देना पसंद करता था। दान उसका रस था। लेकिन यह कोई वक्त है?

तो उसने भिखारी को कहा कि सुनो जी! यह कोई समय है? भिखारी ने कहा कि आप भी सुनो। आप बैंकिंग का धंधा करते हैं, मैं कोई सलाह तो देता नहीं। यह हमारा धंधा है। इसमें हम सलाह किसी की मानते नहीं।

रथचाइल्ड ने प्रकाश जलाया कि इस आदमी को देखना चाहिए, जो दुनिया के बड़े से बड़े करोड़पति को कह सकता है कि सुनो, तुम बैंकिंग का धंधा करते हो, हम तुम्हें कभी सलाह देते नहीं। हमारी सलाह का कोई मतलब भी नहीं, क्योंकि हमें कोई अनुभव भी नहीं। तुम हमें सलाह मत दो। हम जन्मजात भिखारी हैं।

उस आदमी के चेहरे को देखा, वह बड़ा प्रसन्न आदमी था। रथचाइल्ड ने लिखा, मैं मंत्रमुग्ध हो गया। यह हिम्मत भिखारी की नहीं, सम्राट की होती है। रथचाइल्ड को ऐसा कहना, जिसके पास भीख मांगने आए कि चुप! सलाह मत देना। मेरे धंधे को मैं भलीभांति जानता हूं।

रथचाइल्ड ने उसे खूब दिया; और कहा, मैं खुश हुआ इस बात से कि कोई आदमी अपने भिखमंगेपन की भी इतनी प्रतिष्ठा रखता है।

कभी तुम्हें राह का भिखारी भी प्रसन्न मिल सकता है। प्रसन्नता का कोई संबंध इससे नहीं कि तुम्हारे पास क्या है। जो भी तुम्हारे पास है, उसमें अगर रस है तो प्रसन्नता है। तुम अगर हाथ के भिक्षापात्र को भी गीत गुनगुनाते हुए ढो रहे हो तो आनंद है। और तुम्हारे पीछे स्वर्णरथ चल रहे हैं और तुम मुर्दा, बुझे, तो कुछ अर्थ नहीं है।

एकाग्रता मत पूछो। यद्यपि तुम्हें यही सिखाया गया है स्कूल से लेकर विश्वविद्यालय तक। और तुम्हारे तथाकथित धर्मगुरु भी तुम्हें यही सिखाते हैं कि–एकाग्रता। मैं तुमसे कहता हूं, रसमग्नता। वह शब्द हटा दो। क्योंकि वह शब्द सीधा काम का ही नहीं है।

एकाग्रता जरूर आती है, मगर परिणाम की तरह आती है। एकाग्रता साधन नहीं है; जहां रस लोगे वहीं घट आती है। रस के पीछे बंधी चली जाती है। रस की छाया है।

तो तुम कहीं भी रस लो। अगर मंदिर में रस न आता हो, फिक्र छोड़ो। फिर मंदिर में परमात्मा तुम्हारे लिए नहीं घटेगा। जहां रस ही नहीं है, वहां एकाग्रता नहीं होगी। एकाग्रता नहीं होगी, परमात्मा कहां होनेवाला है!

अगर तुम्हें बांसुरी के गीत में रस आता है तो वहीं तुम्हारा परमात्मा तुम्हें मिलेगा। अगर नर्तक की पायलों में तुम्हें रस आता है तो तुम्हारा परमात्मा वहीं नाचेगा।

तुम्हारे परमात्मा की खोज तुम्हारे रस से ही तय होगी। रसो वै सः। उस परमात्मा का स्वभाव रस है। किसी शास्त्र ने नहीं कहा कि परमात्मा का स्वभाव एकाग्रता है। सच्चिदानंद! वह रस की बात है। तुम्हें जहां आ जाए रस,जहां आ जाए आनंद, जहां उमंग उठे, जहां तुम खिल उठो। फिर वह कुछ भी हो। चाहे खेल हो, तो प्रार्थना बन गई। और ऐसे तुम बैठे-बैठे प्रार्थना करते रहो, भजन करते रहो, ध्यान करते रहो; रस उमगे नहीं, मेघमल्हार बजे नहीं, हृदय गुनगुनाए नहीं–ऐसे तुम करते चले जाओ जबर्दस्ती, यंत्रवत,करनी चाहिए, कर्तव्यवश, लोग कहते हैं इससे रस मिलेगा इसलिए कर रहे हैं।

नहीं, जहां रस मिलता है वहीं परमात्मा आता है।

इसलिए मैं तुमसे कहता हूं कि मेरे पास तुम्हें देने के लिए कोई अनुशासन नहीं है। क्योंकि अनुशासन कोई भी होगा, पराया होगा, दूसरे का होगा। तुम्हें अपना अनुशासन खोजना पड़ेगा। प्रत्येक व्यक्ति को अपना मार्ग खोजना पड़ेगा। मैं इशारे देता हूं। उन इशारों से तुम अपना मार्ग समझने की कोशिश करो।

कबीर ज्ञान को भी उपलब्ध हो गए तो भी कपड़ाबुनते रहे। जुलाहापन उन्होंने छोड़ा नहीं। किसी ने पूछा कि अब तो आप बंद करें। कभी सुना नहीं कि कोई बुद्धपुरुषऔर कपड़े बुनता रहा और जुलाहा बना रहा और बाजार में कपड़े बेचने जाता रहा। अब तो छोड़ो।

लेकिन कहते हैं, कबीर ने कहा, इसी कपड़े के बुनने ने तो मुझे परमात्मा से मिलाया। इसे कैसे छोड़ दूं? यह मेरी प्रार्थना। यह मेरी पूजा। यह मेरी अर्चना।

“झीनी झीनी बीनी रे चदरिया।’

वह जुलाहे का गीत है। कोई और दूसरा तो गा भी नहीं सकता। बुद्ध कैसे गाएंगे? बुद्ध ने कभी चदरिया बीनीनहीं। उन्हें कुछ पता भी नहीं। महावीर कैसे गाएंगे? चदरिया थी, वह भी छोड़ दी! उनसे तो पूछो कैसी छोड़ी रे चदरिया,तो बता सकते हैं।

लेकिन कबीर ने बुन-बुनकर पाया। वे ताने-बाने चादर के बुनते-बुनते उनका ध्यान फला। वहीं रसविमुग्धहुए। पर कैसे पाया उन्होंने? क्योंकि हमें बुद्ध की बात समझ में आ जाती है कि दूर बोधिवृक्ष के नीचे ध्यान में बैठे हुए हैं। कि महावीर वनों में, पर्वतों में, एकांत में, बारह वर्ष मौन में खड़े हुए। कबीर…कबीर कपड़ा बुन-बुनकर पा लिए।

रस से बुना होगा। कबीर कहते थे, राम के लिए बुन रहा हूं। सभी ग्राहकों में राम देखते थे। जब अपना कपड़ाबुनकर और काशी के बाजार में बेचने जाते, कोई मिल जाता रास्ते में और कहता, कहां जा रहे हो? तो वे कहते, राम आए होंगे। उनको जरूरत है, कपड़ा बुनकर लाया हूं। बड़ा बढ़िया बुना है। राम को देने जा रहा हूं।

जब कोई ग्राहक उनसे कपड़ा खरीदता तो वे कहते,सम्हालकर रखना राम। बड़ी मेहनत से बुना है। बड़े रस से बुना है। कपड़ा ही नहीं है, पीढ़ी दर पीढ़ी चले ऐसी मजबूती से बुना है। अपने प्राण उंडेले हैं।

तो जिसको ग्राहक में राम दिखाई पड़े, अब उसे किसी बोधिवृक्ष के नीचे जाने की जरूरत न रही। सभी लोग बोधिवृक्ष के नीचे जा भी नहीं सकते। और अच्छा है कि जाते नहीं; नहीं तो बड़ी झंझट खड़ी हो जाए। एकाध बुद्ध बोधिवृक्ष के नीचे बैठता है, चलता है। एकाध महावीर मौन खड़ा हो जाता है, चलता है। लेकिन सभी ऐसे खड़े हो जाएं तो जीवन बड़ा विरस हो जाएगा।

अधिक को तो कबीर जैसा होना पड़ेगा। अधिक को तो गोरा जैसा होना पड़ेगा। गोरा कुम्हार बस घड़े बनाता रहा। और घड़े बनाते-बनाते खुद को भी बना लिया। रैदास जूते सीते-सीते, जूते बनाते-बनाते पहुंच गए।

तो तुम जो कर रहे हो, उसमें रस डालो। उंडेलो रस। वही तुम्हारा भजन, वही तुम्हारा ध्यान।

अगर तुम्हारी सारी चेष्टाएं असफल हो जाएं तो फिर साहस करो। तो फिर तुम गलत जगह हो। तुम कुछ ऐसी जगह बहने की कोशिश कर रहे हो, जो चढ़ाव पर है। तो नदीचढ़ाव पर तो नहीं बहती, ढाल पर ही बह सकती है। रसधार भी ढाल पर ही उतरकर, बहकर मिलता है।

तो फिर बदलो। इसीलिए साहस की जरूरत है। पहले सारी चेष्टा कर लो। और फिर तुम्हें लगे कि नहीं, इस ढंग से मेरे लिए परमात्मा से मिलन नहीं हो सकेगा तोबदलो। उस बदलाहट को मैं संन्यास कहता हूं। बदलने की हिम्मत रखो।

एक आदमी चालीस साल तक लंदन के बाजार में दलाल का काम करता रहा। बड़ा सफल आदमी था। खूब कमाई थी। सब तरह का सुख था। किसी ने कभी सोचा भी न था, एक रात वह घर से नदारद हो गया। पत्नी भी भरोसा न कर सकी, बेटे भी भरोसा न कर सके, मित्र भी भरोसा न कर सके, काम धंधे में जो लोगों से संबंध था वे भी भरोसा न कर सके। क्योंकि न तो वह आदमी कभी किसी और स्त्री के संग में देखा गया था, कि पत्नी सोच भी सके कि वह किसी स्त्री के साथ भाग गया। न उसके कोई धार्मिक रुझान थे कि वह कोई जाकर किसी आश्रम में संन्यासी हो गया होगा। न कोई दुख था कि आत्महत्या कर ली होगी। सब भांति सुखी-संपन्न आदमी था; जिसको हम सुखी-संपन्न कहते हैं, वैसा आदमी था। सब ठीक-ठाक था।

कोई तीन साल बाद उस आदमी का पता चला कि वह पेरिस में चित्रकला सीख रहा है। भिखमंगे की हालत हो गई है। भागे उसके मित्र। उससे कहा, तुमने यह क्या किया?तुम्हारे पास सब था, सब ठीक था। उसने कहा, वही अड़चन थी। सब ठीक था, कहीं कुछ गड़बड़ न थी। लेकिन कोई प्रफुल्लता न थी। कहीं कोई उमंग न थी। सब ठीक चल रहा था और सब ठीक मैं चला रहा था, लेकिन कोई रसधार न बह रही थी।

मेरे जीवन में सदा से आकांक्षा थी कि चित्रकार बनूं। दलाल बनना मैंने कभी चाहा न था। वह सफलता सांयोगिक थी। अब मैं खुश हूं। मेरे पास अब कुछ भी नहीं है। चित्र बनाता हूं, बिक जाते हैं तो भोजन के लायक, कपड़े के लायक इंतजाम कर पाता हूं। अपने पास रहने का छप्पर भी नहीं है। एक मित्र के कमरे में बना हूं, रह रहा हूं। लेकिन वापस मुझे जाना नहीं है। मैं प्रसन्न हूं। और जो मित्र गए थे उन्होंने देखा कि वह आदमी एक अदभुत ऊर्जा से, एक अदभुत आभा से भरा था। सूख गया था शरीर उसका,लेकिन एक रोशनी थी। उसने कहा, मैं किसी से नाराज नहीं हूं। मेरी पत्नी को कहना, मैं किसी से नाराज नहीं हूं। सब ठीक था। मैं बिलकुल, जैसा जिसको हम सुखी-संपन्न कहते हैं, वैसा आदमी था। मेरे बच्चे ठीक हैं, मेरे बेटे ठीक हैं, मेरी पत्नी ठीक है। सब ठीक था।

लेकिन सब ठीक से कहीं कुछ होता? ठीक से कुछ ज्यादा चाहिए। ठीक से क्या होगा? ऐसे तो ठीक-ठीक-ठीक,और मर जाएंगे। सुविधापूर्वक जी लिए और मर गए। नाच तो पैदा ही न हुआ। जीवन में फूल तो खिले ही नहीं।

लौटा नहीं वापस। बड़ा चित्रकार बन गया।

इसे मैं संन्यास कहता हूं। न उसने गैरिक वस्त्र पहने,न वह किसी आश्रम में गया लेकिन इसे मैं संन्यास कहता हूं। संन्यास का अर्थ हुआ, साहस इस बात का कि अगर दिखाई पड़े कि मेरा जीवन मरुस्थल में खोया जा रहा है तो अपनी राह बदल लेने की। चाहे कोई भी कीमत चुकानी पड़े।

आदमी कमजोर है। वह सुविधा से जीता है। चाहे कुछ न मिले, लेकिन सुविधा तो है, सुरक्षा तो है। कुछ न मिले!

इसलिए ये सारे प्रश्न उठते हैं कि एकाग्रता कैसे सधे?तो पहले तो कोशिश करना। सध जाए तो शुभ। चेष्टा करने से पचास प्रतिशत मौके हैं, सध जाएगी। न सधे तो हिम्मत करना। देर मत लगाना, क्योंकि जिंदगी रोज हाथ से सरकीजाती है। जिंदगी उन्हीं की है, जो हिम्मत से जिंदगी को बदलने के लिए तैयार होते हैं। नहीं तो जिंदगी बह जाती है। चिकने घड़े के ऊपर जैसे वर्षा का जल बह जाता है, कुछ भरता-करता नहीं। या उल्टे घड़े पर जैसे वर्षा गिरती रहती है–टप-टप। बहुत आवाज, शोरगुल मचता है लेकिन घड़ा खाली का खाली रहता है। उल्टा रखा है।

तो जरा गौर से देखना। तुम्हारा घड़ा अगर भरता न हो तो कहीं उल्टा तो नहीं रखा है?

तो न तो मौलिक सवाल ध्यान का है, न भजन का है; मौलिक सवाल समझ का है। मन के स्वभाव को समझो।

एकाग्रता की बात ही मत उठाओ, रसमयता की बात उठाओ। रसमयता के पीछे-पीछे तुम पाओगो, एकाग्रता घूंघर बजाती हुई चली आती है।

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